उत्तराखण्ड का चेन्ह,राज्य पुष्प ,पश , वृष,एवं चेन्ह



 

उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न



 सफ़ेद पृष्ठभूमि पर हीरे के आकार वाला नीली परिधि में तीन पर्वत चोटियों की श्रंखला और नीचे चार जलधाराओं से युक्त आकृति है l इस आकृति के ऊपर मध्य में लाल पृष्ठभूमि में भारत का राष्ट्रीय चिन्ह अशोक का लाट अंकित है l अशोक के लाट के नीचे मुण्डकोपनिषद से लिया गया भारत का राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते” अंकित है

उत्तराखंड राज्य चिन्ह के निचले भाग में नीले रंग से उत्तराखंड राज्य अंकित है

राज्य चिन्ह की सफ़ेद पृष्ठभूमि उत्तराखंड के लोगों की शांतिप्रिय प्रकृति को दर्शाती है l ऊपरी भाग में स्थित लाल रंग की पृष्ठभूमि उत्तराखंड राज्य आन्दोलन में शहीद आन्दोलनकारियों के रक्त के प्रतीक स्वरुप दर्शित है तीन पर्वत चोटियों की श्रंखला उत्तराखंड की भौगोलिक एवं पारस्थितिक प्रकृति को दर्शाता है तथा इसके नीचे की चार जलधारायें गंगा नदी को दर्शाती हैं। नीला रंग राज्य की शुद्ध एवं पवित्र नदियों के जल को दर्शाता है

प्रशासनिक एवं राजकीय कार्यों के लिए स्वीकृत उत्तराखण्ड का राज्य चिह्न, उत्तराखण्ड सरकार की राजकीय मोहर है l राज्य चिन्ह में उत्तराखंड की भौगोलिक स्वरुप की झलक देखने को मिलती है

उत्तराखंड का राज्य पुष्प 



उत्तरखंड का राज्य पुष्प ब्रह्मकमल है ब्रह्म कमल हिमालयी क्षेत्रों में 4800-6000 मी की ऊंचाई पर पाया जाने वाला पुष्प है

ब्रह्म कमल का वैज्ञानिक नाम सोसूरिया अबवेलेटा है l यह एस्टेरेसी कुल का पौधा है। सूर्यमुखी, गेंदा, डहलिया, कुसुम एवं भृंगराज इस कुल के अन्य प्रमुख पौधे हैं। 

भारत में को भी 'ब्रह्म कमलकहते हैं। उत्तराखंड में स्थानीय भाषा में इसे 'कौल पद्मनाम से जानते हैं। 

उत्तराखंड में ब्रह्म कमल की 24 प्रजातियां मिलती हैं पूरे विश्व में इसकी 210 प्रजातियां पाई जाती है l उत्तराखंड में फूलों की घाटी, केदारनाथ, शिवलिंग बेस, पिंडारी ग्लेशियर आदि क्षेत्रो में यह पुष्प बहुतायत में मिलते है l  

ब्रह्म कमल के खिलने का समय जुलाई से सितंबर है ब्रह्म कमल, फैनकमल कस्तूरा कमल के पुष्प बैगनी रंग के होते हैं l  

इस पुष्प का वर्णन वेदों में भी मिलता है महाभारत के वन पर्व में इसे 'सौगंधिक पुष्प' कहा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस पुष्प को  केदारनाथ स्थित भगवान शिव को अर्पित करने के बाद विशेष प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। 

ब्रह्म कमल के पौधों की ऊंचाई 70 से 80 सेंटीमीटर होती है जुलाई से सितंबर तक मात्र 3 माह तक फूल खिलते हैं बैगनी रंग का इसका पुष्प टहनियों में ही नहीं, बल्कि पीले पत्तियों से निकले कमल पात के पुष्पगुच्छ के रूप मे खिलता है जिस समय यह पुष्प खिलता है उस समय वहां का वाता

उत्तराखंड का राज्य पशु



उत्तरखंड का राज्य पशु कस्तूरी मृग’ है l यह हिमशिखरों पर 3600 से 4400 मी की ऊंचाई पर पाया जाता है l इस मृग का वैज्ञानिक नाम “मास्कस काइसोगोस्टरहै l इसे हिमालियन मास्क डिअर के नाम से भी जाना जाता है l

अवैध शिकार के कारण इस प्रजाति के मृग विलुप्ति की कगार पर पहुचं रहे है l इस प्रजाति के मृग उत्तराखंड के केदारनाथ, फूलों की घाटी, उत्तरकाशी, एवं पिथौरागढ़ जिले में 2000 से 5000 मी की ऊंचाई पर स्थित जंगलों में पायें जाते है l कस्तूरी मृग उत्तराखंड के आलावा कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, एवं सिक्किम में पाए जाते है

इस मृग का रंग भूरा एवं इसके शरीर पर काले-पीले धब्बे होते है l इसके एक पैर में चार खुर होते है l नर मृग की पूंछ छोटी एवं बाल रहित होती है l

इसका वजन सामान्यतः 10 से 20 किग्रा होता है और ऊंचाई लगभग 20 इंच तक होती है l इस मृग की सूंघने एवं सुनने की क्षमता बहुत अधिक होती है

इस मृग के मुंह में दो बड़े-बड़े दांत होते है और इसकी आयु लगभग 20 वर्ष होती है

कस्तूरी केवल नर मृग में पाया जाता है l जिसका निर्माण एक वर्ष से आयु के मृग के जननांग के समीप ग्रंथि से श्रावित द्रव के नाभि के पास एक गाठनुमा थैली में एकत्र होने से होता है l इसी गाँठ का ऑपरेशन कर गाढ़े द्रव के रूप में कस्त्रुई प्राप्त किया जाता है l एक मृग में एक बार में सामान्यतः 30 से 45 ग्राम तक कस्तूरी प्राप्त की जा सकती है और इससे तीन तीन वर्ष के अंतराल पर कस्तूरी प्राप्त की जा सकती है l

कस्तूरी मृग बेहद शर्मीली प्रवृति का जीव है और यह अपना निवास स्थल किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ता है

मादा मृग की गर्भधारण अवधि 6 माह होती है और एक बार में सामान्यतः एक ही मृग का जन्म होता है

कस्तूरी जटिल प्राकृतिक रसायन है जिससे अद्वितीय सुगंध प्राप्त होती है l इसका उपयोग सुगन्धित सामग्री के आलावा दमा, निमोनिया, हृदय रोग, टायफाइड, मिर्गी आदि रोगों की औषिधियों के निर्माण में किया जाता है

कस्तुरी की मांग एवं मूल्य अधिक होने के कारण इनका अवैध शिकार होता है l जिससे इनकी संख्या एवं लिंगानुपात में तेज़ी से गिरावट आ रही है l यद्यपि सरकार द्वारा इनके संवर्धन एवं संरक्षण के लिए कई प्रयास किये जा रहे है l लेकिन कोई विशेष सफलता नहीं मिल पा रही है

सरकार द्वारा किये गए कुछ प्रयास इस प्रकार है -

1972 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चमोली के केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग के अंतर्गत 967.2 वर्ग किमी क्षेत्र में कस्तूरी मृग विहार की स्थापना की गयी है

1977 में महरुड़ी कस्तूरी मृग अनुसन्धान केंद्र के स्थापन की गयी है

1982 में चमोली जिले के कांचुला खर्क में एक कस्तूरी मृग प्रजनन एवं संरक्षण केंद्र की स्थापना की गयी है

1986 में पिथौरागढ़ में अस्कोट अभ्यारण की स्थापना की गयी है

राज्य की वन्य जीव गणना 2005 के अनुसार कस्तूरी मृगों की संख्या 274 (2003 में) बढ़कर 279 हो गयी है

उत्तराखंड का राज्य पक्षी !!! 


उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल है l यह पक्षी हिमालयी क्षेत्र में लगभग 2500 से 5000 मी (8000 -200000 फीट) की ऊंचाई पर पाया जाता है l इसे हिमालयी मोनाल या हिमालय के मयूर के नाम से जाना जाता है l यह हिमालयी पक्षी विश्व के सबसे सुन्दर पक्षियों में गिना जाता है

मोनाल का वैज्ञानिक नाम लोफ़ोफ़ोरस इम्पॅजेनस है

मोनाल एवं डफिया एक ही प्रजाति के पक्षी है परन्तु मोनाल मादा पक्षी एवं डफिया नर पक्षी है

यह उत्तराखंड का राज्य पक्षी होने के साथ साथ नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी भी है

उत्तराखंड, कश्मीर, असं, नेपाल में स्थानीय भाषा में इस पक्षी को मन्याल या मुनाल के नाम से जाना जाता है

इन पक्षियों का आवास क्षेत्र पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यानमार तथा चीन में है। नर का आकार 26 से 29इंच एवं मादा की लंबाई 24 से 26 इंच  तक होती है

नीले, हरे, काले आदि रंगों के मिश्रण वाले इस पक्षी की पूँछ हरी होती है l इस प्रजाति के नर पक्षी में मोर की तरह रंगीन कलगी होती है l मादा पक्षी केवल भूरे रंग की होती है

मोनाल पक्षी का प्रिय भोजन वनस्पति, जड़े, पत्तियां, झाड़ियों एवं घास की कोपलेंशाहबलूत के फल, बीज, बॅरीकीड़े-मकोड़े एवं आलू है l आलू की फसल को यह पक्षी बहुत नुकसान पहुंचता है

इनके प्रजनन का समय मई-जून होता है l ये पक्षी एक मौसम में केवल एक बार ही अंडे देती है l अंडे को सेने में नर पक्षी कोई सहायता नहीं करता है मादा पक्षी अकेले ही अण्डों को सेती है

यह पक्षी अपना घोंसला नहीं बनाते अपितु किसी चट्टान या पेड़ के छिद्र में अपने अंडे देते है l यह हल्के बादामी रंग के होते हैं और इनमें चॉकलेटी रंग के चित्ते होते हैं।

मांस एवं खाल के लिए मोनाल पक्षी का बहुत शिकार होता है जिससे दिन-प्रतिदिन इनकी संख्या घटती जा रही है l  

उत्तराखंड का राज्य वृक्ष !!!



उत्तरखंड का राज्य वृक्ष बुरांस है ,यह वृक्ष 1500 से 4000 मी की ऊंचाई पर पाया जाता है

बुरांस का वैज्ञानिक नाम रोडोडेन्ड्रोन अरबोरियम है ,यह एक पर्वतीय वृक्ष होता है और इसे मैदानों में नहीं उगाया जा सकता है

बुरांस के फूल बसंत के मौसम में खिलते है और अपनी सुन्दर फूलों से उत्तराखंड के प्राकृतिक सौन्दर्य को और भी बड़ा देते है

बुरांस के फूलों का रंग गहरा लाल होता है l 11 हजार फुट की ऊंचाई पर सफ़ेद रंग के बुरांस पाया जाता है

बुरांस का फूल मकर संक्रांति के बाद गर्मी बढ़ने के साथ धीरे-धीरे खिलना शुरू होता है और बैशाखी तक पूरा खिल जाता है l उसके बाद गर्मी बढ़ने के कारण इसके फूल सूखकर गिरने लगते है

बुरांस के फूल का रस हृदय रोग के लिए अत्यंत लाभकारी होता है l बुरांस के फूलों से रंग भी बनाया जाता है

बुरांस के वृक्ष की लम्बाई लगभग 20 से 25 फीट होती है l इसके पत्तों से खाद बनाया जाता है

बुरांस के पेड़ के संरक्षण के लिए लगातार प्रायर किये जा रहे है इसके अवैध कटान को रोकने के लिए वन अधिनियम १९७४ में इसे संरक्षित वृक्ष घोषित किया गया है परन्तु इसके पश्चात् भी यह संरक्षित नहीं हो पा रहा है

उत्तराखंड का राज्य फल !!!



उत्तराखंड का राज्य फल काफल है काफल का पेड़ 4000 फीट से 6000 फीट की उंचाई में उगता है। काफल का वैज्ञानिक नाम मिरिका एस्कुलेंटा  है

यह एक सदाबहार वृक्ष है। 

यह छोटा गुठली युक्त बेरी जैसा फल होता है जो कि गुच्छों में आता है काफल जब कच्चा होता है तब यह हरे रंग का होता है और पकने पर बेहद लाल हो जाता है, तभी इसे खाया जाता है। काफल का स्वाद थोड़ा खट्टा एवं थोड़ा मीठा होता है l इसे बॉक्स मर्टल’ और ‘बेबेरी’ भी कहा जाता है। 

उत्तराखंड में काफल को देवों का फल माना जाता है

ये फल उत्तराखंड के अलावा हिमाचल प्रदेश और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है । मार्च के महीने से काफल के पेड़ में फल आने शुरू हो जाते हैं और अप्रैल महीने की शुरुआत के बाद यह हरे-भरे फल लाल हो जाते हैं और मई-जून तक काफल के फल रहते है l काफल का पेड़ अनेक प्राकृतिक औषधीय गुणों से भरपूर है। आयुर्वेद में काफल को भूख की अचूक दवा माना जाता है यानी कि यह फल भूख बढाता है। काफल के पेड़ की छाल चर्मशोधन में प्रयोग की जाती है l काफल का फल खाने से गर्मी में ठंडक का एहसास होता है साथ ही यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है l यह हृदय रोग, मधुमय रोग उच्च एंव निम्न रक्त चाप आदि रोगों में बहुत लाभदायक होता है

उत्तराखंड के कई परिवार गर्मियों में काफल को बेचकर अपनी रोजी-रोटी कमाते है l काफल का फल अधिक देर तक रखे जाने पर खाने योग्य नहीं रह पाता है l इसलिए इसे एक स्थान से दूर कहीं दूसरे स्थान को नहीं भेजा जा सकता है l अतः उत्तराखंड आकर ही काफल का स्वाद चखा जा सकता है

इतने औषिधीय गुणों से संपन्न होने के कारण भी काफल के फल का संरक्षण नहीं किया जा रहा है l इनकी संख्या अत्यंत कम हो गयी है l  

उत्तराखंड की राज्य तितली



उत्तराखंड की राज्य तितली 'कॉमन पीकॉक' नाम की तितली प्रजाति है जिसे राज्य वन्य जीव बोर्ड ने राज्य तितली का दर्जा 2016 में दिया है। इस तितली का वैज्ञानिक नाम 'पैपिलियो पॉलिटर'  है

'कॉमन पीकॉकतितली की एक दुर्लभ प्रजाती है यह भारत के हिमालयी क्षेत्रों में 7000 फीट की ऊंचाई में पाई जाती है। इसका आकर 90 से 130 मिमी तक होता है

इस तितली का रंग मोर जैसा होने के कारण ही इसका नाम 'कॉमन पीकॉक बटरफ्लाई' रखा गया है। इस खास तितली को मार्च से अक्टूबर के मध्य देखा जा सकता हैं।

उत्तराखंड में तितलियों की 500 से अधिक प्रजातियाँ पायी जाती है इसलिए इसे तितलियों का घर भी कहा जाता है

1996 में इसने भारत की सबसे सुंदर तितली के रूप में लिम्का बुक में अपना रिकाॅर्ड बनाया

काॅमन पिकाॅक का अस्तित्व तिमूर के पेड़ पर निर्भर है, यह तिमूर के पत्ते खाती है एवं तिमूर के पेड़ पर अंडे देती है । कॉमन पीकॉक सर्दी के मौसम में प्यूपा रूप में सुप्त अवस्था में चली जाती है। मार्च के महीने में प्यूपा फिर से सक्रिय हो जाता है

महाराष्ट्र ‘ब्लू मॉर्मन’ को राज्य तितली घोषित करने वाला प्रथम राज्य है जबकि उत्तराखंड तितली को राज्य चिन्ह में शामिल करने वाला देश का दूसरा राज्य है। 

उत्तराखंड की राज्य मिठाई !!!


 


उत्तराखंड की राज्य मिठाई बाल मिठाई है ,यह मिठाई भूरे चॉकलेटी रंग की होती है जिसके ऊपर चीनी के सफ़ेद दाने चिपके होते है , अल्मोड़ा की बाल मिठाई सबसे अधिक प्रसिद्ध हैl ,अल्मोड़ा को उत्तराखंड का सांकृतिक नगरभी कहा जाता है

भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी अल्मोड़ा की बाल मिठाई की खूब मांग रहती है

उत्तराखंड का राज्य खेल !!!



उत्तराखंड का राज्य खेल फुटबॉल है 2011 में भाजपा सरकार ने फुटबॉल को राज्य खेल का दर्जा दिया

उत्तराखंड का राज्य गीत!!!



उत्तराखंड का राज्य गीत उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि है , यह गीत हेमंत बिष्ट द्वारा लिखा गया है और इसे लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी एवं गायिका अनुराधा निराला जी ने गाया है l इस गीत में कुल 7 पद्य है जिसमे से पहले तीन पद्य हिंदी एवं अंतिम चार पद्य गढ़वाली एवं कुमाऊँनी में लिखे गए है  

6 फ़रवरी 2016 को उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि’ को उत्तराखंड का राज्य गीत का दर्जा दिया गया था 

उत्तराखंड राज्य गीत की पंक्तियाँ इस प्रकार है

उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन


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